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।।सामीप्य।।

यह कविता प्रेम और आत्मीयता का संदेश देती है। प्रियजन का स्पर्श कवि की हर परेशानी को मिटा देता है और उनका सामीप्य जीवन में स्नेह और शांति बढ़ाता है। कवि इस पावन संबंध को मेघ और धरती जैसा मानते हुए इसकी सार्वभौमिकता की कामना करता है। ---- एक स्पर्श तुम्हारे इन हाथों का, कर जाता है शमन मेरी हर दुविधाओं का। बढ़ जाता है नेह, अविराम, अविरल, पाता जब यह सामीप्य तुम्हारा। उत्कंठित हूँ, यह पावन संबंध, चराचर में सर्वत्र व्याप्त हो, उस मेघ की तरह, जिससे मेरे हृदय रूपी धरा की , प्यास बुझती है। ---- संस्कृत रूपांतरण: एकः स्पर्शःतव एतेषु करयोः,शमं करोतिमम सर्वासां संशयानां। वर्धते स्नेहः,अविरामः, अविरलः,लब्ध्वा यदा एषः सन्निधिं तव। उत्कण्ठितोऽस्मि,यदेतत् पावनं सम्बन्धम्,चराचरे सर्वत्र व्याप्नुयात्,तस्मिन् मेघे इव,येन मम हृदय-धरा-सदृशीतृष्णा शम्यते। ---- शब्दकार;- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।आखिर मैं क्या लिखूँ।।

यह कविता जीवन, समाज और व्यक्ति की उलझनों और चुनावों को व्यक्त करती है। कवि यह सवाल करता है कि उसे क्या लिखना चाहिए, क्योंकि उसके पास अनेकों विकल्प हैं—कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक। यह कविता जीवन के विविध पहलुओं, जैसे सुख-दुःख, शिक्षा, समाज, परिवार, धर्म, और राजनीतिक विचारधाराओं पर विचार करती है। कवि यह भी पूछता है कि उसे अपनी जिंदगी के कौन से अनुभवों को दर्ज करना चाहिए, और किस दृष्टिकोण से। कविता यह संदेश देती है कि जीवन में जब हम किसी मार्ग का चुनाव करते हैं, तो हमें अपने अनुभवों, आस्थाओं और दृष्टिकोणों को संतुलित रूप से समझने की आवश्यकता होती है। यह कविता विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि हम अपनी जिंदगी के हर पहलू को किस प्रकार से देखेंगे और लिखेंगे—क्या हम सकारात्मकता पर ध्यान देंगे या नकारात्मकता को भी उतनी ही अहमियत देंगे? ---- आखिर मैं क्या लिखूँ ? काल के कपाल पर लिखूँ, या फिर अपना वर्तमान लिखूँ। फूलों का हार लिखूँ, या फिर काँटों की सेज लिखूँ। आखिर मैं क्या लिखूँ ? तुम्हारा यश लिखूँ या फिर अपना अपयश लिखूँ। जीने की आस लिखूँ या फिर मृत्यु का वास लिखूँ। आखिर मैं क्या ल...

।।समर्पण।।

यह कविता गहरे प्रेम और समर्पण का संदेश देती है, जहाँ कवि का जीवन उस प्रिय व्यक्ति से शुरू होकर उसी पर समाप्त होता है। "नदी और नाव" का रूपक इस रिश्ते की अटूटता और सहयोग को दर्शाता है। हर पल, हर समय, कवि का जीवन उसी व्यक्ति से रोशन और पूर्ण है। ---- एक कहानी, तुमसे शुरू, तुमसे खत्म, जैसे बहती नदी संग नाव का संयोग। हर पल रोशन, मेरी सुबह और शाम, तुमसे ही दिन, तुमसे ही रात। एक कहानी, तुमसे शुरू होकर, तुम पर ही समाप्त। ---- एक कथा,त्वया आरब्धा, त्वयि समाप्ता। यथा वहति नदी सख्या नौकायाः संयोगः। सर्वे क्षणाः प्रभासिता, मम प्रातः सायं च, त्वया एव दिनं, त्वया एव रात्रिः। एक कथा,त्वया आरभ्य, त्वयि एव समाप्ता। ---- रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।संघर्ष।।

यह कविता हमें जीवन में साहस, संघर्ष और आत्मविश्वास का महत्व समझाती है। इसका मुख्य संदेश है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों और बंधनों से डरकर नहीं, बल्कि उनका डटकर सामना करना चाहिए। कविता बताती है कि जीवन की समस्याएँ और संघर्ष अनिवार्य हैं, लेकिन हमें कभी हार मानकर घुट-घुटकर नहीं जीना चाहिए। हमें अपनी परिस्थितियों को बदलने के लिए साहसिक कदम उठाने चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए। अंत में, यह संदेश देती है कि हर इंसान को अपने जीवन में "अभिमन्यु" बनना चाहिए—एक ऐसा योद्धा जो मुश्किल हालातों से लड़ते हुए भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है। यह कविता हमें प्रेरणा देती है कि चाहे कितनी भी बाधाएँ हों, हमें अपने सपनों और लक्ष्यों के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। ---- न तो संघर्ष का अंत होता है, न ही खत्म होती है ये जिंदगी। हर पल मजबूर करती है, बेबस होकर जीने की ये बंदिशें। माना कि, नया सवेरा आना है, पर कब तक घुट-घुट कर जीना है? पर हर बंधन को तोड़, अपने पथ पर बढ़ जाऊँगा, जीवन के इस चक्रव्यूह में, अभिमन्यु कहलाऊँगा। ---- संस्कृत रूपांतरण: न संघर्षस्य अन्तः कदापि भवति, न च जीवनस्य समाप्...

।।आत्मनिरीक्षण।।

यह कविता मनुष्य को बाहरी दिखावे और समाज के सामने अपने आचरण का प्रमाण देने की बजाय अपने भीतर झांकने और आत्मनिरीक्षण करने की प्रेरणा देती है। रचनाकार ने यह समझाने का प्रयास किया है कि सच्चा मनुष्यत्व केवल बाहरी आदर्शों और संस्कारों के पालन में नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन की पवित्रता और सत्यता में निहित है। मनुष्यत्व का प्रमाण, सिर्फ बाह्य जगत को ही न दीजिए।। संस्कारों का बाह्य मुखौटा हटाइए अपनी अंतरात्मा को पहचानिए जिसमें न जाने कितने अदृश्य प्रेत छिपे बैठे हैं अदृश्य प्रेत ;- अपने भीतर छिपे दोषों, कुरीतियों और विकारों मनुष्यत्वस्य प्रमाणं केवलं बाह्यजगते न ददात। संस्काराणां बाह्यावरणं त्यजत। स्वां अंतरात्मानं परिचिनुत, यत्र न जानि कियतः अदृश्याः प्रेताः निहिताः सन्ति। अदृश्याः प्रेताः: स्वान्तः स्थिताः दोषाः, कुप्रथाः, च विकाराः। रचनाकार- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।जिंदगी।।

इस कविता का भावार्थ जीवन की अनिश्चितताओं और कठोर वास्तविकताओं को उजागर करना है। यह जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जो कभी खुशी देते हैं तो कभी गहरे दु:ख में डाल देते हैं। कविता में बताया गया है। ---- जो हँसना चाहता है, उसे भी रोना सिखा देती है, यह ज़िंदगी है साहब, ज़िंदों को भी मुर्दा बना देती है। सपने दिखाती है पल-पल, फिर उन्हें तोड़ भी जाती है, यह ज़िंदगी है साहब, पल में अपने रंग बदल जाती है। जहाँ फूलों की आस हो, वहाँ काँटे उगा जाती है, यह जिंदगी है साहब , जीते-जी इंसान को पत्थर दिल बना जाती है। जो राह रोशन किया था, उसे अंधेरे में बदल देती है, यह ज़िंदगी है साहब, दिन को रात बना देती है। जो हँसना चाहता है, उसे भी रोना सिखा देती है, यह ज़िंदगी है साहब, ज़िंदों को भी मुर्दा बना देती है। ---- संस्कृत रूपांतरण यः हसितुम् इच्छति, तमपि रुदितं शिक्षयति, एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, जीवतां अपि मृतं कर्तुम् अर्हति। स्वप्नानि प्रदर्शयति प्रतिपलम्, तानि च तोडयति, एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, पलमात्रेण स्वं रंगं परिवर्तयति। यत्र पुष्पाणां आशा अस्ति, तत्र कांटानि उत्पद्यन्ति। ...

।।भ्रम।।

कवि इस कविता जे माध्यम से यह बताना चाहता है कि गलत आदतें और कमजोर क्षण इंसान को अपने सच्चे रिश्तों और मूल्यों से दूर कर सकती हैं। हमें अपने निर्णयों और उनके प्रभावों पर सावधान रहना चाहिए। ---- शराब की लत लगाई क्या तुमने? उनसे बेवफ़ाई कराई क्या तुमने? जो रहते थे कभी उनकी यादों में रात-दिन, शराब पिला कर वो राह भुलाई क्यों तुमने? ---- संस्कृत रूपांतरण मद्यारोगं कृतवान् किं त्वम्?तेषां विश्वासघातं कारितवान् किं त्वम्?ये स्मर्तुं शीलिताः दिननिशं तेषां स्मृतिम्,मद्यं पाययित्वा तान् मार्गं भ्रान्तवान् किं त्वम्? ---- रचनाकार ;- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।नकाब।।

इस कविता में जीवन के उस पहलू का वर्णन किया गया है, जहाँ सत्य और झूठ के प्रति समाज का दृष्टिकोण उजागर होता है। कवि कहता है कि उसकी ज़िंदगी का किरदार अजीब और जटिल है। जब वह सत्य बोलता है, तो लोग उस पर विश्वास नहीं करते, लेकिन जब वह झूठ बोलता है, तो सभी उसे सहजता से मान लेते हैं। इससे वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि उसने इस झूठी और बनावटी दुनिया में अपनी एक ऐसी छवि बना ली है, जहाँ सत्य का मूल्य नहीं और झूठ को स्वीकार्यता मिलती है। मजबूरी में, उसे "नकाब" पहनकर, यानी खुद को ढककर और अपनी वास्तविकता को छिपाकर, जीने के लिए विवश होना पड़ता है। यह कविता समाज की विडंबनाओं और व्यक्तिगत संघर्ष को प्रकट करती है, जहाँ सत्य का स्थान नगण्य हो गया है और झूठ का बोलबाला है। यह मनुष्य की उस मनःस्थिति को दर्शाती है, जो अपने अस्तित्व और सामाजिक स्वीकृति के बीच संघर्ष कर रही है। ---- अजीब किरदार है मेरी ज़िंदगी का, सच बोलूँ तो कोई मानता नहीं, झूठ सदा सब मान लेते हैं। कैसी छवि बना ली है मैंने इस झूठी दुनिया में, अब नकाब पहनकर ही जी लेता हूँ।। ---- विचित्रः पात्रोऽस्मिन्मम जीवने।सत्यं वदामि ...

।।तन्हाई।।

यह कविता गहरी भावनाओं और जीवन की जटिलताओं का प्रतीक है। इसका मुख्य संदेश चाहत, तन्हाई, और असफलता के बावजूद संघर्ष और उम्मीद का दर्पण है। ---- मैं वह किनारा था, जिसे नदी की चाह थी, सूखे सपनों पर गरजते बादलों की राह थी। मिलन की आस में तन्हा ही बहता गया, जिसे अपना माना, उसकी यादों में जलता गया। ---- संस्कृत रूपान्तर अहं तु तटः, यस्य नद्याः सदा स्पृहा अभवत्।न च कदापि गर्जितं मेघेन, न च वारि प्रपतनम्।संगम-कामनया संतप्तोऽहं शुष्कतया स्थितः,यस्य सर्वस्वं मत्वा, तस्य विरहे दग्धोऽभवम्। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।सुलह।।

यह कविता परस्पर संबंधों में संवाद, क्षमा, और मेलजोल का महत्व उजागर करती है। इसका मुख्य संदेश यह है कि किसी भी विवाद या मनमुटाव को दूर करने के लिए संवाद और समझौते का अंतिम प्रयास किया जाना चाहिए। कविता में निम्नलिखित बातें उभरकर आती हैं: संवाद का महत्व: संवाद ही वह माध्यम है जिससे समस्याओं का समाधान निकल सकता है। मौन या दूरी को खत्म कर परस्पर बातचीत करनी चाहिए। भूतकाल को भुलाना: पुराने गिले-शिकवे, दोष और शिकायतों को क्षमा कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। मेलजोल का प्रयास: यदि मेलजोल का दीप प्रज्वलित हो, तो उसे पूरी तरह जलने देना चाहिए। इसका अर्थ है कि जब रिश्तों में सुधार की संभावना हो, तो उसे पूरा समर्थन दिया जाए। निर्णय की स्पष्टता: यदि प्रयास विफल हो, तो अनिश्चितता में रहने के बजाय स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए—चाहे वह दूरी स्वीकार करना ही क्यों न हो। अंतिम प्रयास: यह कविता संधि या समझौते के लिए किया गया एक अंतिम प्रयास दर्शाती है। यदि यह सफल होता है, तो सर्वोत्तम है, अन्यथा एक स्थायी दूरी को अपनाना ही बेहतर है। ---- आइए, बैठिए, कुछ बातें कीजिए। भूतकाल के गिले-शिकवे दूर कीजिए। ...

।।जब शब्दों का पतझड़ आता है।।

यह कविता संवेदनशीलता, भावनाओं की गहराई, और शब्दों की सीमाओं को उजागर करती है, साथ ही यह संदेश देती है कि कभी-कभी मौन और आँसू ही सबसे प्रामाणिक अभिव्यक्ति बन जाते हैं। "शब्दों का पतझड़" का तात्पर्य है कि ऐसी स्थिति में शब्दों की कमी या उनका महत्वहीन हो जाना, क्योंकि भावनाएँ इतनी प्रबल होती हैं कि उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्द अपर्याप्त लगते हैं। हृदय उद्वेलित जब स्पंदित होता, मनोमस्तिष्क भी थर-थर कम्पित होता है। नयनों के पावन गंगाजल में, सर्वभावों का संगम होता है। जब शब्दों का पतझड़ आता है।। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।अकेलापन।।

कवि इस कविता के माध्यम से जीवन की चुनौतियों, अकेलेपन, और अस्थायी राहत की सीमाओं को उजागर करता है। यह संदेश देता है कि जब जीवन में गहन दर्द और कठिनाई हो, तो सच्चे समाधान की तलाश करना और सही मार्ग अपनाना महत्वपूर्ण है। ---- अब तो बेकार ही भटकता हूँ इन सर्द वादियों में, नहीं मिलता कोई हमदर्द इन सर्द राहों में। मेरा वजूद कहीं खो गया है, तुम्हें कैसे बताऊँ, रातों में सुकून ढूँढ़ता हूँ मयख़ानों में। ---- अधुना निष्फलः सञ्चरामि एषु शीतलपर्वतप्रदेशेषु।न कोऽपि सन्दृष्टोऽभूत् मम सहृदयः एषु शीतमार्गेषु॥मम अस्तित्वं कुतश्चिन नष्टं, कथं ते निवेदयामि।रात्रिषु शान्तिं प्राप्नोमि सुरालयेषु॥ ---- रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।अलौकिक तलाश।।

कवि अपने जीवन में किसी अलौकिक, अद्भुत और अतुलनीय अनुभव का जिक्र कर रहा है। वह अनुभव इतना गहन और प्रभावशाली है कि उसे जीवन का नया आधार मिलने का एहसास होता है। जिस व्यक्ति या चीज़ की तलाश उसने हर जगह की थी—गली-गली, रास्ते-रास्ते, और हर बाग-बगीचे में—वही अनुभव, जिसे वह सपनों में देखता था, अंततः उसे आकर ऐसा गहरा आघात देता है, मानो उसके अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया हो। यहाँ "कत्ल" प्रतीकात्मक रूप से उस गहरे असर और बदलाव का संकेत है, जिसने कवि की पूरी सोच और भावनाओं को बदल दिया। ---- आलौकिक, अद्भुत, अतुलनीय रूप का दीदार हो गया, मुझे लगा जीने का आधार मिल गया। जिसको ढूंढा था हर गली, हर राह, हर गुलिस्तां में, सपनों में आकर उसने ही मेरा कत्ल कर दिया। ---- आलौकिकं अद्भुतं अतुलनीयं रूपं दृष्टं यथा।जीवितुं कारणं प्राप्तं मम।यः गच्छितं सर्वे गली-मार्गे-सर्वे गुलिस्तानेषु,सप्नेभ्यां आगत्य तेन मम हननं कृतम्। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।

यह शेर एक व्यक्ति की संघर्ष और बदलाव की कहानी को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि पहले जो व्यक्ति बहुत उत्साही और मजबूत था (जैसे भुजाओं में ताकत और कदमों में गति), समय के साथ उसकी ताकत में कमी आई और उसकी आत्मा में अंधकार छा गया। यह शेर जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव और जज़्बे की कमी से उत्पन्न निराशा का प्रतीक है। ---- इन भुजाओं में ही दम कम था, इसीलिए इन कदमों में थम था। वो जज्बा, जो था कभी रौशनी, अब उसी दिल में अंधकार था। ---- एषां भुजयोः क्षीणो बलं आसीत्,तस्मात् एषां पादयोः स्थग्नं आसीत्।यः उत्साहः कदाचित् आसीत् ज्योतिरेव,सः आत्मनि अंधकारः आसीत्। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।जीते जी जो नखरे दिखाए, वो इंसान है।।

मनुष्य के जीवन में चाहे जितने भी आडंबर हों, अंततः मृत्यु के बाद सब कुछ ईश्वर के न्याय पर निर्भर होता है। यह शेर हमें सादगी, सत्य और सही कर्मों की ओर प्रेरित करता है, क्योंकि ईश्वर के न्याय के सामने कोई नखरा काम नहीं आता। ---- जीते जी जो नखरे दिखाए, वो इंसान है, मौत के बाद जो हिसाब करे, वो भगवान है।। ---- संस्कृत अनुवाद: जीवन्नेव यो विभ्रमं दर्शयति, सः मानवः। मरणोत्तरं यः न्यायं करोति, सः भगवान्। ---- रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।बेफिक्र रहो यारों, अब मैं बर्बाद हूँ।।

यह शेर एक भावनात्मक स्थिति को व्यक्त करता है, जहां व्यक्ति ने अपनी हार को स्वीकार किया है और उसे यह महसूस हो रहा है कि जो कभी उसका था, वह अब उससे दूर हो चुका है। यह शेर दुख, अकेलापन और जीवन की कठिनाइयों के बारे में है। बेफिक्र रहो यारों, अब मैं बर्बाद हूँ, जो था कभी मेरा, अब वो भी रुखसत हुआ है। संस्कृत अनुवाद:- निश्चिन्ततया भवत, अहम् अत्र नाशितोऽस्मि,यत् कदाचित् मम आसीत्, तत् अपि परित्यक्तं गतं। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।साँसों की डोरी।।

यह कविता जीवन की नश्वरता और मृत्यु के अपरिहार्य सत्य को व्यक्त करती है। "साँसों की पतली डोरी" का प्रतीक जीवन की सांसें हैं, जो निरंतर चलती रहती हैं। जब तक यह डोरी (साँस) चलती रहती है, तब तक व्यक्ति इस "इहलोक" में विचरण करता है, यानी जीवित रहता है। जब यह डोरी रुक जाती है (यानी जब मृत्यु आ जाती है), तब व्यक्ति "परलोक" की ओर चला जाता है। इसका तात्पर्य है कि मृत्यु एक अपरिहार्य और स्थायी सत्य है, जिसे टाला नहीं जा सकता। साँसों की पतली डोरी, चढ़ती-उतरती, जब तक है चलती। इहलोक विचरती, यदि रुक जाए, परलोक विचरती।। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।शज़र को डाल से, यह कहते सुना।।

इस शेर का संक्षिप्त संदेश यह है कि प्रकृति (पेड़/शज़र) और उसके रक्षक (बिश्नोई समाज) हमारे सच्चे हमदर्द और रक्षक हैं। हमें उनके प्रयासों की सराहना करनी चाहिए और उनके प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए, क्योंकि वे हर संकट में प्रकृति और मानवता की रक्षा करते हैं। ---- शज़र को डाल से यह कहते सुना, समाज-ए-बिश्नोई को हमदर्द बना। जो बचाए हमें हर आंधी-तूफां से, उनके जज़्बे को सलाम, उनका एहसान माना।। शज़र;- वृक्ष ,वृक्ष समूह। ---- शाखां प्रति वृक्षो वदति स्म नित्यम्,बिश्नोयि-समाजं सुहृदम् प्रकल्प्य।योऽस्मान् रक्षति सर्वत: विपद्भ्य:,तस्य भावं नमस्कृत्य, कृतज्ञतां स्मराम:। ---- रचनाकार:-  दिनेश कुमार पाण्डेय