।।साँसों की डोरी।।

यह कविता जीवन की नश्वरता और मृत्यु के अपरिहार्य सत्य को व्यक्त करती है। "साँसों की पतली डोरी" का प्रतीक जीवन की सांसें हैं, जो निरंतर चलती रहती हैं। जब तक यह डोरी (साँस) चलती रहती है, तब तक व्यक्ति इस "इहलोक" में विचरण करता है, यानी जीवित रहता है।
जब यह डोरी रुक जाती है (यानी जब मृत्यु आ जाती है), तब व्यक्ति "परलोक" की ओर चला जाता है। इसका तात्पर्य है कि मृत्यु एक अपरिहार्य और स्थायी सत्य है, जिसे टाला नहीं जा सकता।

साँसों की पतली डोरी,
चढ़ती-उतरती,
जब तक है चलती।
इहलोक विचरती,
यदि रुक जाए,
परलोक विचरती।।

रचनाकार:-
दिनेश कुमार पाण्डेय

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।।स्मरण।।

।।संघर्ष।।

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।