।।संघर्ष।।

यह कविता हमें जीवन में साहस, संघर्ष और आत्मविश्वास का महत्व समझाती है। इसका मुख्य संदेश है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों और बंधनों से डरकर नहीं, बल्कि उनका डटकर सामना करना चाहिए।

कविता बताती है कि जीवन की समस्याएँ और संघर्ष अनिवार्य हैं, लेकिन हमें कभी हार मानकर घुट-घुटकर नहीं जीना चाहिए। हमें अपनी परिस्थितियों को बदलने के लिए साहसिक कदम उठाने चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए।

अंत में, यह संदेश देती है कि हर इंसान को अपने जीवन में "अभिमन्यु" बनना चाहिए—एक ऐसा योद्धा जो मुश्किल हालातों से लड़ते हुए भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है। यह कविता हमें प्रेरणा देती है कि चाहे कितनी भी बाधाएँ हों, हमें अपने सपनों और लक्ष्यों के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
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न तो संघर्ष का अंत होता है,
न ही खत्म होती है ये जिंदगी।

हर पल मजबूर करती है,
बेबस होकर जीने की ये बंदिशें।

माना कि, नया सवेरा आना है,
पर कब तक घुट-घुट कर जीना है?

पर हर बंधन को तोड़, अपने पथ पर बढ़ जाऊँगा,
जीवन के इस चक्रव्यूह में, अभिमन्यु कहलाऊँगा।
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संस्कृत रूपांतरण:

न संघर्षस्य अन्तः कदापि भवति,
न च जीवनस्य समाप्तिः।

प्रत्येकं क्षणं प्रेरयति,
दुर्बलं सन्तं बन्धनेन जीवनाय।

सत्यं खलु, नवः प्रभातः आगन्तव्यः,
किन्तु कियद्वारं श्वासं रोद्धुं जीवितं च?

किन्तु सर्वान् बन्धनान् विदार्य, स्वमार्गे गमिष्यामि,
जीवनस्य अस्मिन् चक्रव्यूहे अभिमन्यु इति कथिष्ये।
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रचनाकार:-
दिनेश कुमार पाण्डेय

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।।स्मरण।।

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।