।।तन्हाई।।

यह कविता गहरी भावनाओं और जीवन की जटिलताओं का प्रतीक है। इसका मुख्य संदेश चाहत, तन्हाई, और असफलता के बावजूद संघर्ष और उम्मीद का दर्पण है।
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मैं वह किनारा था, जिसे नदी की चाह थी,
सूखे सपनों पर गरजते बादलों की राह थी।
मिलन की आस में तन्हा ही बहता गया,
जिसे अपना माना, उसकी यादों में जलता गया।
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संस्कृत रूपान्तर

अहं तु तटः, यस्य नद्याः सदा स्पृहा अभवत्।न च कदापि गर्जितं मेघेन, न च वारि प्रपतनम्।संगम-कामनया संतप्तोऽहं शुष्कतया स्थितः,यस्य सर्वस्वं मत्वा, तस्य विरहे दग्धोऽभवम्।

रचनाकार:-
दिनेश कुमार पाण्डेय

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।।स्मरण।।

।।संघर्ष।।

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।