।।जिंदगी।।
इस कविता का भावार्थ जीवन की अनिश्चितताओं और कठोर वास्तविकताओं को उजागर करना है। यह जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जो कभी खुशी देते हैं तो कभी गहरे दु:ख में डाल देते हैं। कविता में बताया गया है।
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जो हँसना चाहता है, उसे भी रोना सिखा देती है,
यह ज़िंदगी है साहब, ज़िंदों को भी मुर्दा बना देती है।
सपने दिखाती है पल-पल, फिर उन्हें तोड़ भी जाती है,
यह ज़िंदगी है साहब, पल में अपने रंग बदल जाती है।
जहाँ फूलों की आस हो, वहाँ काँटे उगा जाती है,
यह जिंदगी है साहब ,जीते-जी इंसान को पत्थर दिल बना जाती है।
जो राह रोशन किया था, उसे अंधेरे में बदल देती है,
यह ज़िंदगी है साहब, दिन को रात बना देती है।
जो हँसना चाहता है, उसे भी रोना सिखा देती है,
यह ज़िंदगी है साहब, ज़िंदों को भी मुर्दा बना देती है।
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संस्कृत रूपांतरण
यः हसितुम् इच्छति, तमपि रुदितं शिक्षयति,
एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, जीवतां अपि मृतं कर्तुम् अर्हति।
स्वप्नानि प्रदर्शयति प्रतिपलम्, तानि च तोडयति,
एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, पलमात्रेण स्वं रंगं परिवर्तयति।
यत्र पुष्पाणां आशा अस्ति, तत्र कांटानि उत्पद्यन्ति।
एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, जीविते मानवं शिला-हृदयं कर्तुम् अर्चयति।
यः मार्गं प्रदीप्तं कर्तुम्, तम अंधकारे परिणमयति,
एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, दिनं रात्रिं कर्तुम् अर्हति।
यः हसितुम् इच्छति, तमपि रुदितं शिक्षयति,
एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, जीवतां अपि मृतं कर्तुम् अर्हति।
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रचनाकार:-
दिनेश कुमार पाण्डेय
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