।।सुलह।।

यह कविता परस्पर संबंधों में संवाद, क्षमा, और मेलजोल का महत्व उजागर करती है। इसका मुख्य संदेश यह है कि किसी भी विवाद या मनमुटाव को दूर करने के लिए संवाद और समझौते का अंतिम प्रयास किया जाना चाहिए। कविता में निम्नलिखित बातें उभरकर आती हैं:

संवाद का महत्व:
संवाद ही वह माध्यम है जिससे समस्याओं का समाधान निकल सकता है। मौन या दूरी को खत्म कर परस्पर बातचीत करनी चाहिए।

भूतकाल को भुलाना:
पुराने गिले-शिकवे, दोष और शिकायतों को क्षमा कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

मेलजोल का प्रयास:
यदि मेलजोल का दीप प्रज्वलित हो, तो उसे पूरी तरह जलने देना चाहिए। इसका अर्थ है कि जब रिश्तों में सुधार की संभावना हो, तो उसे पूरा समर्थन दिया जाए।

निर्णय की स्पष्टता:
यदि प्रयास विफल हो, तो अनिश्चितता में रहने के बजाय स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए—चाहे वह दूरी स्वीकार करना ही क्यों न हो।

अंतिम प्रयास:
यह कविता संधि या समझौते के लिए किया गया एक अंतिम प्रयास दर्शाती है। यदि यह सफल होता है, तो सर्वोत्तम है, अन्यथा एक स्थायी दूरी को अपनाना ही बेहतर है।

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आइए, बैठिए,
कुछ बातें कीजिए।
भूतकाल के गिले-शिकवे दूर कीजिए।
मौन को दफन कीजिए।

कुछ आप भूलिए,
कुछ हमें भूलने दीजिए।
संवाद की डोर जुड़ने दीजिए।

यदि सुलह की लौ जले,
तो उसे तीव्रता से जलने दीजिए।
अन्यथा,
उसे ओहापोह की स्थिति से
चक्रवात में बह जाने दीजिए।

यह अंतिम प्रयास है संधि का।
बात बने तो सर्वोत्तम है,
नहीं तो अनंतकालीन फासले बन जाने दीजिए।।
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संस्कृत रूपान्तर

आगच्छत, उपविशत,
किञ्चित् संवादं कुर्मः।
भूतकालस्य दोषानां क्षमां कृत्वा,
मौनं विलापयामः।
किञ्चिद् भवतः विस्मरतु,
किञ्चिदस्मान् विस्मर्तु।
संवादसूत्रं पुनः सम्बध्यताम्।

यदि मेलस्य दीपः ज्वलति,
तर्हि तं तीव्रेण ज्वलनं करोतु।
अन्यथा,
तम् संदेहस्य स्थितेः मुक्त्वा,
चक्रवातेन नयतु।

एषः अन्तिमः प्रयासः संधये।
यद्युपक्रमः सफलः भवेत्, तर्हि श्रेयः।
नो चेत्,
अनन्तकालस्य विषमां दूरीं स्वीकुर्मः।
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रचनाकार:-
दिनेश कुमार पाण्डेय

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।।स्मरण।।

।।संघर्ष।।

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।