।।नकाब।।
इस कविता में जीवन के उस पहलू का वर्णन किया गया है, जहाँ सत्य और झूठ के प्रति समाज का दृष्टिकोण उजागर होता है। कवि कहता है कि उसकी ज़िंदगी का किरदार अजीब और जटिल है। जब वह सत्य बोलता है, तो लोग उस पर विश्वास नहीं करते, लेकिन जब वह झूठ बोलता है, तो सभी उसे सहजता से मान लेते हैं।
इससे वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि उसने इस झूठी और बनावटी दुनिया में अपनी एक ऐसी छवि बना ली है, जहाँ सत्य का मूल्य नहीं और झूठ को स्वीकार्यता मिलती है। मजबूरी में, उसे "नकाब" पहनकर, यानी खुद को ढककर और अपनी वास्तविकता को छिपाकर, जीने के लिए विवश होना पड़ता है।
यह कविता समाज की विडंबनाओं और व्यक्तिगत संघर्ष को प्रकट करती है, जहाँ सत्य का स्थान नगण्य हो गया है और झूठ का बोलबाला है। यह मनुष्य की उस मनःस्थिति को दर्शाती है, जो अपने अस्तित्व और सामाजिक स्वीकृति के बीच संघर्ष कर रही है।
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अजीब किरदार है मेरी ज़िंदगी का,
सच बोलूँ तो कोई मानता नहीं,
झूठ सदा सब मान लेते हैं।
कैसी छवि बना ली है मैंने इस झूठी दुनिया में,
अब नकाब पहनकर ही जी लेता हूँ।।
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विचित्रः पात्रोऽस्मिन्मम जीवने।सत्यं वदामि चेत् कोऽपि न विश्वसति।अनृतं वदामि तु सर्वे विश्वसन्ति।कथं रूपं निर्मितं मयाऽस्मिन् मिथ्यालोके।इदानीं मुखावरणं धारयित्वा एव जीवामि।
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रचनाकार:-
दिनेश कुमार पाण्डेय
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