।।आत्मनिरीक्षण।।
यह कविता मनुष्य को बाहरी दिखावे और समाज के सामने अपने आचरण का प्रमाण देने की बजाय अपने भीतर झांकने और आत्मनिरीक्षण करने की प्रेरणा देती है। रचनाकार ने यह समझाने का प्रयास किया है कि सच्चा मनुष्यत्व केवल बाहरी आदर्शों और संस्कारों के पालन में नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन की पवित्रता और सत्यता में निहित है।
मनुष्यत्व का प्रमाण,
सिर्फ बाह्य जगत को ही न दीजिए।।
संस्कारों का बाह्य मुखौटा हटाइए
अपनी अंतरात्मा को पहचानिए
जिसमें न जाने कितने अदृश्य प्रेत छिपे बैठे हैं
अदृश्य प्रेत ;- अपने भीतर छिपे दोषों, कुरीतियों और विकारों
मनुष्यत्वस्य प्रमाणं
केवलं बाह्यजगते न ददात।
संस्काराणां बाह्यावरणं त्यजत।
स्वां अंतरात्मानं परिचिनुत,
यत्र न जानि कियतः अदृश्याः प्रेताः निहिताः सन्ति।
अदृश्याः प्रेताः: स्वान्तः स्थिताः दोषाः, कुप्रथाः, च विकाराः।
रचनाकार-
दिनेश कुमार पाण्डेय
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