।।आखिर मैं क्या लिखूँ।।

यह कविता जीवन, समाज और व्यक्ति की उलझनों और चुनावों को व्यक्त करती है। कवि यह सवाल करता है कि उसे क्या लिखना चाहिए, क्योंकि उसके पास अनेकों विकल्प हैं—कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक। यह कविता जीवन के विविध पहलुओं, जैसे सुख-दुःख, शिक्षा, समाज, परिवार, धर्म, और राजनीतिक विचारधाराओं पर विचार करती है। कवि यह भी पूछता है कि उसे अपनी जिंदगी के कौन से अनुभवों को दर्ज करना चाहिए, और किस दृष्टिकोण से। कविता यह संदेश देती है कि जीवन में जब हम किसी मार्ग का चुनाव करते हैं, तो हमें अपने अनुभवों, आस्थाओं और दृष्टिकोणों को संतुलित रूप से समझने की आवश्यकता होती है।

यह कविता विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि हम अपनी जिंदगी के हर पहलू को किस प्रकार से देखेंगे और लिखेंगे—क्या हम सकारात्मकता पर ध्यान देंगे या नकारात्मकता को भी उतनी ही अहमियत देंगे?
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आखिर मैं क्या लिखूँ ?
काल के कपाल पर लिखूँ, या फिर अपना वर्तमान लिखूँ।
फूलों का हार लिखूँ, या फिर काँटों की सेज लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
तुम्हारा यश लिखूँ या फिर अपना अपयश लिखूँ।
जीने की आस लिखूँ या फिर मृत्यु का वास लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
गुरुजन का स्नेह लिखूँ या फिर दंड विधान लिखूँ।
ज्ञान लिखूँ या फिर अपना अज्ञान लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
चिड़ियों का चहचहाना लिखूँ, या फिर चकोर का क्रंदन लिखूँ।
मुर्गे की उदघोष लिखूँ या फिर सिंह की दहाड़ लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
धरती का श्रृंगार लिखूँ या फिर नदियों का कलरव लिखूँ।
सूर्य का प्रकाश लिखूँ या फिर रात का अंधकार लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
गीता का सार लिखूँ या फिर कुरान की सीख लिखूँ।
जिसने जितना दिया या फिर उसका हिसाब लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
पिता का बलिदान लिखूँ या फिर माता का वात्सल्य लिखूँ।
भाई का प्यार लिखूँ या फिर बहन का सम्मान लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
दीपावली की चमक लिखूँ या फिर अपनों से बिछड़ने का गम लिखूँ।
भारत का गुणगान लिखूँ या फिर आतंकवाद का प्रसार लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
मुफलिसी का आलम लिखूँ या फिर पूंजीवाद का विस्तार लिखूँ।
साम्यवाद लिखूँ या फिर सामंतवाद पर लिखूँ।
आखिर मैं क्या लिखूँ ?
बता मेरी जिंदगी,
आखिर मैं क्या-क्या लिखूँ
कब कब लिखूँ ,
क्यों लिखूँ नहीं लिखूँ।।
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रचनाकार;-
दिनेश कुमार पाण्डेय

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।।स्मरण।।

।।संघर्ष।।

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।