।।सामीप्य।।
यह कविता प्रेम और आत्मीयता का संदेश देती है। प्रियजन का स्पर्श कवि की हर परेशानी को मिटा देता है और उनका सामीप्य जीवन में स्नेह और शांति बढ़ाता है। कवि इस पावन संबंध को मेघ और धरती जैसा मानते हुए इसकी सार्वभौमिकता की कामना करता है।
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एक स्पर्श
तुम्हारे इन हाथों का,
कर जाता है शमन
मेरी हर दुविधाओं का।
बढ़ जाता है नेह,
अविराम, अविरल,
पाता जब यह सामीप्य तुम्हारा।
उत्कंठित हूँ,
यह पावन संबंध,
चराचर में सर्वत्र व्याप्त हो,
उस मेघ की तरह,
जिससे मेरे हृदय रूपी धरा की ,
प्यास बुझती है।
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संस्कृत रूपांतरण:
एकः स्पर्शःतव एतेषु करयोः,शमं करोतिमम सर्वासां संशयानां।
वर्धते स्नेहः,अविरामः, अविरलः,लब्ध्वा यदा एषः सन्निधिं तव।
उत्कण्ठितोऽस्मि,यदेतत् पावनं सम्बन्धम्,चराचरे सर्वत्र व्याप्नुयात्,तस्मिन् मेघे इव,येन मम हृदय-धरा-सदृशीतृष्णा शम्यते।
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शब्दकार;-
दिनेश कुमार पाण्डेय
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