।।जब शब्दों का पतझड़ आता है।।

यह कविता संवेदनशीलता, भावनाओं की गहराई, और शब्दों की सीमाओं को उजागर करती है, साथ ही यह संदेश देती है कि कभी-कभी मौन और आँसू ही सबसे प्रामाणिक अभिव्यक्ति बन जाते हैं।
"शब्दों का पतझड़" का तात्पर्य है कि ऐसी स्थिति में शब्दों की कमी या उनका महत्वहीन हो जाना, क्योंकि भावनाएँ इतनी प्रबल होती हैं कि उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्द अपर्याप्त लगते हैं।


हृदय उद्वेलित जब स्पंदित होता,
मनोमस्तिष्क भी थर-थर कम्पित होता है।
नयनों के पावन गंगाजल में,
सर्वभावों का संगम होता है।
जब शब्दों का पतझड़ आता है।।

रचनाकार:-
दिनेश कुमार पाण्डेय

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।।स्मरण।।

।।संघर्ष।।

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।