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इश्क़ की आहट सुनाऊं कैसे

यह शेर प्रेम की गहरी और जटिल भावनाओं को व्यक्त करता है। इसमें व्यक्ति अपनी आंतरिक पीड़ा, संघर्ष और दिल की गहरी लहरों को शब्दों में व्यक्त करने की कठिनाई को दर्शाता है। वह चाहकर भी अपने जज़्बातों को सामने नहीं ला पा रहा है और यह सवाल कर रहा है कि उन भावनाओं को कैसे प्रकट करे। शेर यह संदेश देता है कि कुछ भावनाएँ इतनी गहरी और अभिव्यक्त करने में इतनी कठिन होती हैं कि उन्हें शब्दों में ढालना मुश्किल हो जाता है। ---- इश्क़ की आहट सुनाऊं कैसे , तुम पर चाबुक चलाऊं कैसे। दिल की गहराईयों में जो लहरें उठी हैं वह तुम्हें दिखाऊं कैसे? ---- रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

हमने उनसे इश्क किया, पर कोई खसारा न था,

संक्षेप में, यह रचना बताती है कि सच्चा प्यार कभी नुकसान नहीं पहुंचाता, परंतु जब प्रेमी छोड़ जाता है, तो वह अकेला और बेसहारा हो जाता है। ---- हमने उनसे इश्क किया, पर कोई खसारा न था, वो हमें छोड़ गए, अब कोई सहारा न था। ---- तैः प्रियं कृतं, न किञ्चित् हानिः समागच्छत्।तेन मां परित्यक्तं, न कश्चिद् सहायकः प्राप्तः। ---- रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

इज़्हार-ए-इश्क

यह शेर गहरे अर्थों और तीव्र भावनाओं को व्यक्त करता है। इसका संदेश यह है कि प्रेम (इश्क) केवल साधारण रूप से जताने की चीज़ नहीं है, बल्कि इसे किसी असाधारण और प्रभावशाली तरीके से व्यक्त करना चाहिए। यहाँ "कातिल" शब्द रूपक के रूप में उपयोग किया गया है, जो यह संकेत देता है कि प्रेमी को अपनी भावनाओं को इतना मजबूत और प्रभावी बनाना चाहिए कि वह अपने प्रेम के प्रभाव से सबको मोहित कर दे। --- जताना हो गर इश्क, तो कुछ यूं बड़ा कर, आशिक नहीं, खुद को कातिल बना कर। ---- यदि प्रेमः प्रदर्शयितुं ते इच्छा भवेत्, तर्हि किञ्चित् महानं कृत्यम् आचर। न केवलं प्रेयसी, आत्मानं प्रहारिणं कुरु। ---- रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय १.१.२०२५

।।विरोधाभास।।

इस शेर का संदेश यह है कि एक व्यक्ति भले ही बाहरी रूप से पराजित दिखे, लेकिन उसकी पराजय में भी किसी और की जीत छिपी है। यह जीत बाहरी नहीं, बल्कि भावनाओं, शब्दों या समझदारी की हो सकती है। शेर गहराई से इस बात को उभारता है कि हार और जीत केवल परिस्थिति पर नहीं, बल्कि दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। ---- हार गया मैं आज किसी से, जीत गया वह बात किसी से। ---- संस्कृत अनुवाद अद्याहं केनापि पराजितः,स वार्तया केनापि विजयी अभवत्। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।स्मरण।।

यह कविता प्रेम और समर्पण के उस स्तर को प्रकट करती है जहां किसी के अस्तित्व का उद्देश्य दूसरों के जीवन को संवारना बन जाता है। यह जीवन की क्षणिकता के बावजूद स्मृतियों में जीवित रहने की शक्ति को रेखांकित करती है। मेरे मरने का अर्थ ज़रूर निकलेगा, तुम्हारे लिए एक नया सूरज ज़रूर उगेगा। मैं मिट जाऊँ, फिर भी कोई बात नहीं, तुम्हारे स्मृति-नभ में छा कर रहूँगा ।। संस्कृत रूपांतरण: मम मरणस्यार्थः नूनं निष्पन्नो भविष्यति।त्वदर्थं नवः आदित्यः नूनं उदेष्यति।अहं विनश्येयम्, तदपि किंचित् न दोषः।त्वदीय-स्मृति-गगने आच्छाद्य स्थितः भविष्यामि। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।अंदाज़े-बयाँ।।

वह साफ़-गो है, मगर अंदाज़े-बयाँ देख, बातों में खंजर, मगर दिल का जहाँ देख।। संस्कृत रूपान्तर:- सत्यवादी सः, परन्तु वचनैः विचारय, वाक्येषु तीक्ष्णता, किन्तु हृदये विशालता। English Translation He speaks with clarity, but observe his manner of expression, Words like daggers, yet a heart full of compassion. रचनाकार :- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।मर्यादा।।

मर्यादाओं की सीमा वह पार गयी, कल तक थी जो गाय, आज वह सांड हो गयी, लेना ही पड़ता है, हर किसी को, जीवन में, कभी न कभी, ऐसा, अमर्यादित रूप, क्योंकि दुष्टों  को केवल यही भाषा समझ आती है।। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।यादें तुम्हारी पूस की रात।।

यह कविता यादों के गहरे प्रभाव को व्यक्त करती है, जैसे "पूस की रात" असहनीय अनुभवों से युक्त होती है उसी तरह नायक की मानसिक स्थिति यह है कि इन यादों के कारण उसे शांति नहीं मिल रही। यह भावना उस व्यक्ति से जुड़ी गहरी भावनात्मक यादों को दर्शाती है, जो दोनों के बीच एक अनकहा संबंध बनाती है। यादें न केवल नायक को, बल्कि दूसरे व्यक्ति को भी चैन से सोने नहीं देतीं। यादें तुम्हारी, पूस की रात, कंपकंपा देती हैं मुझे यह दिन-रात। सोए तो तुम भी नहीं होंगे अमन-ओ-चैन से, क्योंकि यादें हमारी, वही पूस की रात। संस्कृत रूपान्तरण: तव स्मृतयः, पूसमासे रात्रेः, कम्पयन्ति मां याः दिनरात्रेण। शयनं कृत्वा त्वं अपि न सिध्येः शान्तिम्, यः कारणं स्मृतयः अस्मिन्स्म पूसिकायां रात्रे । रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।ख़ामोशी।।

इस कविता का भाव एक व्यक्ति के शराब की लत और इसके कारण उसके घर-परिवार में उत्पन्न होने वाली उदासी और मानसिक खामोशी को व्यक्त करता है। कविता में शराब का सेवन एक प्रतीक के रूप में दिखाया गया है, जो व्यक्ति की आंतरिक दुनिया और उसके परिवार के बीच की दूरी और असंतोष को दर्शाता है। कल कुछ रूमानी ही तो की थी रात मयख़ाने में इतनी भी नहीं पी थी शराब ।। न कोई दंगा, न कोई फ़साद, फिर भी न जाने क्यों, घर-परिवार है उदास। शायद ख़ामोशी की आहट में छिपा है कोई राज़,या ख़्वाब और ख़्याल की कोई अधूरी आवाज़। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय