यह कविता प्रेम और समर्पण के उस स्तर को प्रकट करती है जहां किसी के अस्तित्व का उद्देश्य दूसरों के जीवन को संवारना बन जाता है। यह जीवन की क्षणिकता के बावजूद स्मृतियों में जीवित रहने की शक्ति को रेखांकित करती है। मेरे मरने का अर्थ ज़रूर निकलेगा, तुम्हारे लिए एक नया सूरज ज़रूर उगेगा। मैं मिट जाऊँ, फिर भी कोई बात नहीं, तुम्हारे स्मृति-नभ में छा कर रहूँगा ।। संस्कृत रूपांतरण: मम मरणस्यार्थः नूनं निष्पन्नो भविष्यति।त्वदर्थं नवः आदित्यः नूनं उदेष्यति।अहं विनश्येयम्, तदपि किंचित् न दोषः।त्वदीय-स्मृति-गगने आच्छाद्य स्थितः भविष्यामि। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय
यह कविता हमें जीवन में साहस, संघर्ष और आत्मविश्वास का महत्व समझाती है। इसका मुख्य संदेश है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों और बंधनों से डरकर नहीं, बल्कि उनका डटकर सामना करना चाहिए। कविता बताती है कि जीवन की समस्याएँ और संघर्ष अनिवार्य हैं, लेकिन हमें कभी हार मानकर घुट-घुटकर नहीं जीना चाहिए। हमें अपनी परिस्थितियों को बदलने के लिए साहसिक कदम उठाने चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए। अंत में, यह संदेश देती है कि हर इंसान को अपने जीवन में "अभिमन्यु" बनना चाहिए—एक ऐसा योद्धा जो मुश्किल हालातों से लड़ते हुए भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है। यह कविता हमें प्रेरणा देती है कि चाहे कितनी भी बाधाएँ हों, हमें अपने सपनों और लक्ष्यों के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। ---- न तो संघर्ष का अंत होता है, न ही खत्म होती है ये जिंदगी। हर पल मजबूर करती है, बेबस होकर जीने की ये बंदिशें। माना कि, नया सवेरा आना है, पर कब तक घुट-घुट कर जीना है? पर हर बंधन को तोड़, अपने पथ पर बढ़ जाऊँगा, जीवन के इस चक्रव्यूह में, अभिमन्यु कहलाऊँगा। ---- संस्कृत रूपांतरण: न संघर्षस्य अन्तः कदापि भवति, न च जीवनस्य समाप्...
यह शेर एक व्यक्ति की संघर्ष और बदलाव की कहानी को दर्शाता है। इसमें बताया गया है कि पहले जो व्यक्ति बहुत उत्साही और मजबूत था (जैसे भुजाओं में ताकत और कदमों में गति), समय के साथ उसकी ताकत में कमी आई और उसकी आत्मा में अंधकार छा गया। यह शेर जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव और जज़्बे की कमी से उत्पन्न निराशा का प्रतीक है। ---- इन भुजाओं में ही दम कम था, इसीलिए इन कदमों में थम था। वो जज्बा, जो था कभी रौशनी, अब उसी दिल में अंधकार था। ---- एषां भुजयोः क्षीणो बलं आसीत्,तस्मात् एषां पादयोः स्थग्नं आसीत्।यः उत्साहः कदाचित् आसीत् ज्योतिरेव,सः आत्मनि अंधकारः आसीत्। रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय
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