।।मर्यादा।।

मर्यादाओं की सीमा वह पार गयी,
कल तक थी जो गाय,
आज वह सांड हो गयी,
लेना ही पड़ता है,
हर किसी को,
जीवन में,
कभी न कभी,
ऐसा,
अमर्यादित रूप,
क्योंकि
दुष्टों  को केवल यही भाषा समझ आती है।।

रचनाकार:-
दिनेश कुमार पाण्डेय

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।।स्मरण।।

।।संघर्ष।।

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।