।।यादें तुम्हारी पूस की रात।।

यह कविता यादों के गहरे प्रभाव को व्यक्त करती है, जैसे "पूस की रात" असहनीय अनुभवों से युक्त होती है उसी तरह नायक की मानसिक स्थिति यह है कि इन यादों के कारण उसे शांति नहीं मिल रही। यह भावना उस व्यक्ति से जुड़ी गहरी भावनात्मक यादों को दर्शाती है, जो दोनों के बीच एक अनकहा संबंध बनाती है। यादें न केवल नायक को, बल्कि दूसरे व्यक्ति को भी चैन से सोने नहीं देतीं।

यादें तुम्हारी,
पूस की रात,
कंपकंपा देती हैं मुझे यह दिन-रात।
सोए तो तुम भी नहीं होंगे अमन-ओ-चैन से,
क्योंकि यादें हमारी, वही पूस की रात।

संस्कृत रूपान्तरण:

तव स्मृतयः,
पूसमासे रात्रेः,
कम्पयन्ति मां याः दिनरात्रेण।
शयनं कृत्वा त्वं अपि न सिध्येः शान्तिम्,
यः कारणं स्मृतयः अस्मिन्स्म पूसिकायां रात्रे

रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

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।।स्मरण।।

।।संघर्ष।।

।। इन भुजाओं में ही दम कम था।।