संदेश

स्मृतियों की सरगम

स्मृति नभ को तुमने आज फिर झकझोर दिया, बीते कल के सपनों को फिर से संजो दिया। खामोश दिल में उठी यादों की सरगम, अनकहे एहसासों को शब्दों से जोड़ दिया।

।।सामीप्य।।

यह कविता प्रेम और आत्मीयता का संदेश देती है। प्रियजन का स्पर्श कवि की हर परेशानी को मिटा देता है और उनका सामीप्य जीवन में स्नेह और शांति बढ़ाता है। कवि इस पावन संबंध को मेघ और धरती जैसा मानते हुए इसकी सार्वभौमिकता की कामना करता है। ---- एक स्पर्श तुम्हारे इन हाथों का, कर जाता है शमन मेरी हर दुविधाओं का। बढ़ जाता है नेह, अविराम, अविरल, पाता जब यह सामीप्य तुम्हारा। उत्कंठित हूँ, यह पावन संबंध, चराचर में सर्वत्र व्याप्त हो, उस मेघ की तरह, जिससे मेरे हृदय रूपी धरा की , प्यास बुझती है। ---- संस्कृत रूपांतरण: एकः स्पर्शःतव एतेषु करयोः,शमं करोतिमम सर्वासां संशयानां। वर्धते स्नेहः,अविरामः, अविरलः,लब्ध्वा यदा एषः सन्निधिं तव। उत्कण्ठितोऽस्मि,यदेतत् पावनं सम्बन्धम्,चराचरे सर्वत्र व्याप्नुयात्,तस्मिन् मेघे इव,येन मम हृदय-धरा-सदृशीतृष्णा शम्यते। ---- शब्दकार;- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।आखिर मैं क्या लिखूँ।।

यह कविता जीवन, समाज और व्यक्ति की उलझनों और चुनावों को व्यक्त करती है। कवि यह सवाल करता है कि उसे क्या लिखना चाहिए, क्योंकि उसके पास अनेकों विकल्प हैं—कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक। यह कविता जीवन के विविध पहलुओं, जैसे सुख-दुःख, शिक्षा, समाज, परिवार, धर्म, और राजनीतिक विचारधाराओं पर विचार करती है। कवि यह भी पूछता है कि उसे अपनी जिंदगी के कौन से अनुभवों को दर्ज करना चाहिए, और किस दृष्टिकोण से। कविता यह संदेश देती है कि जीवन में जब हम किसी मार्ग का चुनाव करते हैं, तो हमें अपने अनुभवों, आस्थाओं और दृष्टिकोणों को संतुलित रूप से समझने की आवश्यकता होती है। यह कविता विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि हम अपनी जिंदगी के हर पहलू को किस प्रकार से देखेंगे और लिखेंगे—क्या हम सकारात्मकता पर ध्यान देंगे या नकारात्मकता को भी उतनी ही अहमियत देंगे? ---- आखिर मैं क्या लिखूँ ? काल के कपाल पर लिखूँ, या फिर अपना वर्तमान लिखूँ। फूलों का हार लिखूँ, या फिर काँटों की सेज लिखूँ। आखिर मैं क्या लिखूँ ? तुम्हारा यश लिखूँ या फिर अपना अपयश लिखूँ। जीने की आस लिखूँ या फिर मृत्यु का वास लिखूँ। आखिर मैं क्या ल...

।।समर्पण।।

यह कविता गहरे प्रेम और समर्पण का संदेश देती है, जहाँ कवि का जीवन उस प्रिय व्यक्ति से शुरू होकर उसी पर समाप्त होता है। "नदी और नाव" का रूपक इस रिश्ते की अटूटता और सहयोग को दर्शाता है। हर पल, हर समय, कवि का जीवन उसी व्यक्ति से रोशन और पूर्ण है। ---- एक कहानी, तुमसे शुरू, तुमसे खत्म, जैसे बहती नदी संग नाव का संयोग। हर पल रोशन, मेरी सुबह और शाम, तुमसे ही दिन, तुमसे ही रात। एक कहानी, तुमसे शुरू होकर, तुम पर ही समाप्त। ---- एक कथा,त्वया आरब्धा, त्वयि समाप्ता। यथा वहति नदी सख्या नौकायाः संयोगः। सर्वे क्षणाः प्रभासिता, मम प्रातः सायं च, त्वया एव दिनं, त्वया एव रात्रिः। एक कथा,त्वया आरभ्य, त्वयि एव समाप्ता। ---- रचनाकार:- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।संघर्ष।।

यह कविता हमें जीवन में साहस, संघर्ष और आत्मविश्वास का महत्व समझाती है। इसका मुख्य संदेश है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों और बंधनों से डरकर नहीं, बल्कि उनका डटकर सामना करना चाहिए। कविता बताती है कि जीवन की समस्याएँ और संघर्ष अनिवार्य हैं, लेकिन हमें कभी हार मानकर घुट-घुटकर नहीं जीना चाहिए। हमें अपनी परिस्थितियों को बदलने के लिए साहसिक कदम उठाने चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए। अंत में, यह संदेश देती है कि हर इंसान को अपने जीवन में "अभिमन्यु" बनना चाहिए—एक ऐसा योद्धा जो मुश्किल हालातों से लड़ते हुए भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है। यह कविता हमें प्रेरणा देती है कि चाहे कितनी भी बाधाएँ हों, हमें अपने सपनों और लक्ष्यों के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। ---- न तो संघर्ष का अंत होता है, न ही खत्म होती है ये जिंदगी। हर पल मजबूर करती है, बेबस होकर जीने की ये बंदिशें। माना कि, नया सवेरा आना है, पर कब तक घुट-घुट कर जीना है? पर हर बंधन को तोड़, अपने पथ पर बढ़ जाऊँगा, जीवन के इस चक्रव्यूह में, अभिमन्यु कहलाऊँगा। ---- संस्कृत रूपांतरण: न संघर्षस्य अन्तः कदापि भवति, न च जीवनस्य समाप्...

।।आत्मनिरीक्षण।।

यह कविता मनुष्य को बाहरी दिखावे और समाज के सामने अपने आचरण का प्रमाण देने की बजाय अपने भीतर झांकने और आत्मनिरीक्षण करने की प्रेरणा देती है। रचनाकार ने यह समझाने का प्रयास किया है कि सच्चा मनुष्यत्व केवल बाहरी आदर्शों और संस्कारों के पालन में नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन की पवित्रता और सत्यता में निहित है। मनुष्यत्व का प्रमाण, सिर्फ बाह्य जगत को ही न दीजिए।। संस्कारों का बाह्य मुखौटा हटाइए अपनी अंतरात्मा को पहचानिए जिसमें न जाने कितने अदृश्य प्रेत छिपे बैठे हैं अदृश्य प्रेत ;- अपने भीतर छिपे दोषों, कुरीतियों और विकारों मनुष्यत्वस्य प्रमाणं केवलं बाह्यजगते न ददात। संस्काराणां बाह्यावरणं त्यजत। स्वां अंतरात्मानं परिचिनुत, यत्र न जानि कियतः अदृश्याः प्रेताः निहिताः सन्ति। अदृश्याः प्रेताः: स्वान्तः स्थिताः दोषाः, कुप्रथाः, च विकाराः। रचनाकार- दिनेश कुमार पाण्डेय

।।जिंदगी।।

इस कविता का भावार्थ जीवन की अनिश्चितताओं और कठोर वास्तविकताओं को उजागर करना है। यह जीवन के उन पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जो कभी खुशी देते हैं तो कभी गहरे दु:ख में डाल देते हैं। कविता में बताया गया है। ---- जो हँसना चाहता है, उसे भी रोना सिखा देती है, यह ज़िंदगी है साहब, ज़िंदों को भी मुर्दा बना देती है। सपने दिखाती है पल-पल, फिर उन्हें तोड़ भी जाती है, यह ज़िंदगी है साहब, पल में अपने रंग बदल जाती है। जहाँ फूलों की आस हो, वहाँ काँटे उगा जाती है, यह जिंदगी है साहब , जीते-जी इंसान को पत्थर दिल बना जाती है। जो राह रोशन किया था, उसे अंधेरे में बदल देती है, यह ज़िंदगी है साहब, दिन को रात बना देती है। जो हँसना चाहता है, उसे भी रोना सिखा देती है, यह ज़िंदगी है साहब, ज़िंदों को भी मुर्दा बना देती है। ---- संस्कृत रूपांतरण यः हसितुम् इच्छति, तमपि रुदितं शिक्षयति, एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, जीवतां अपि मृतं कर्तुम् अर्हति। स्वप्नानि प्रदर्शयति प्रतिपलम्, तानि च तोडयति, एषा जीवनं अस्ति स्वामिन्, पलमात्रेण स्वं रंगं परिवर्तयति। यत्र पुष्पाणां आशा अस्ति, तत्र कांटानि उत्पद्यन्ति। ...